टीलों की चमक : श्री जयनाथ ‘नलिन’ द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक – कहानी | Teelon Ki Chamak : by Shri Jaynath ‘Nalin’ Hindi PDF Book – Story (Kahani)

Book Nameटीलों की चमक / Teelon Ki Chamak
Author
Category, , , ,
Language
Pages 156
Quality Good
Size 4 MB
Download Status Available

टीलों की चमक पीडीऍफ़ पुस्तक का संछिप्त विवरण : अहोभाग्य आपके दर्शन पाये ! धन्य-थन्य, हे श्री लक्ष्मीवाहन जी, अति- मन-भावन जी,
सुजन-सुहावन जी, श्री महाउलूक जी ! आप तो महग्रेष्ठ, पर मैं तो रहा हाथ, चिमगादड़ ही ! कहकर सहजूजी
आनन्द-रोमांच से फूल उठे | सोचा, अब तो खा गया मुँड की बेटा, यह चित्रकूटिया सघुक्कड़ा ! चिमगादड़ से
अधिक नीचातिनीच और तच्छातितुच्छ, और क्या…

Teelon Ki Chamak PDF Pustak Ka Sankshipt Vivaran : Ahobhagy Apake darshan paye ! Dhany-dhany, he Shri Lakshmivahan Ji, ati- man-bhavan ji, Sujan-suhavan ji, Shri Mahaulook ji ! Aap to Mahashreshth, par main to raha hath, Chimagadad hi ! Kahkar sahajooji Anand-Romanch se phool uthe. Socha, ab to kha gaya muni ki beta, yah chitrakootiya saghukkada ! Chimagadad se adhik Neechatineech aur tachchhatituchchh, aur kya…….

Short Description of Teelon Ki Chamak Hindi PDF Book : Good luck seeing you! Blessed-Blessed, O Shri Lakshmivahana Ji, Ati-Mana-Bhavan ji, Sujan-Suhavan ji, Shri Mahauluk ji! You are the best, but I am the hand, only Chimgadad !! Saying this, Sahaju ji rose with joy and thrill. Thought, now I have eaten my son, this Chitrakoota Saghukkada! More inferior and frivolous than Chimgadad, what else …….

 

“मैं मानवता से हैरान हूँ। क्योंकि मनुष्य पैसा कमाने के लिए अपने स्वास्थ्य को बलिदान करता है। फिर अपने स्वास्थ्य को पाने के लिए वह धन खर्च करता है। वह भविष्य के बारे में इतना चिंतित रहता है कि वर्तमान का आनंद नहीं लेता है; नतीजा यह होता है कि वह न वर्तमान में और न भविष्य में जीता है; वह ऐसे जीता है जैसे कि कभी मरने वाला नहीं है, और फिर मरता है जैसे वास्तव में कभी जिया ही नहीं हो।” ‐ दलाई लामा
“I am surprised by humanity. Because a man sacrifices his health in order to make money. Then he sacrifices money to recuperate his health. And then he is so anxious about the future that he does not enjoy the present; the result being that he does not live in the present or the future; he lives as if he is never going to die, and then dies having never really lived.” ‐ Dalai Lama

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