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बूँद और समुद्र / Boond Aur Samudra

बूँद और समुद्र : अमृतलाल नागर द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक - उपन्यास | Boond Aur Samudra : by Amritlal Nagar Hindi PDF Book - Novel (Upanyas)
पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name बूँद और समुद्र / Boond Aur Samudra
Author
Category, , , ,
Language
Pages 380
Quality Good
Size 41.7 MB
Download Status Available

सभी मित्र हस्तमैथुन के ऊपर इस जरूरी विडियो को देखे, ज्यादा से ज्यादा ग्रुप में शेयर करें| भगवान नाम जप की शक्ति को पहचान कर उसे अपने जीवन का जरुरी हिस्सा बनाये|

पुस्तक का विवरण : छ – सात वर्ष पहले महिपाल शुक्ल के कारण ही उनका सज्जन से परिचय हुआ था। यह परिचय अब गाढ़ी मेत्री बन गया है । सज्जन कर्नल और महिपाल अभिन्न माने जाते है । लेखक महिपाल इन दोनो से अपेक्षाकृत बहुत गरीब है पर बडा मेहनती खरा और दोस्ती निभानेवाला जीव है | दा सज्जन के कमरे मे पैर रखते ही कर्नल ने पूछा…….

Pustak Ka Vivaran : Chh -Sat varsh phale Mahipal Shukl ke karan hi unka sajjan se parichay hua tha . Yah parichay ab gadhi metri ban gaya hai . Sajjan Karnal aur Mahipal abhinn mane jate hai . Lekhak mahipal in dono se apekshakrt bahut garib hai par bada mehnati khara aur dosti nibhanevala jiv hai . Da sajjan ke kamre me pair rakhte hi kanel ne poochha……..

Description about eBook : He was introduced to Sajjan only six-six years ago due to Mahipal Shukla. This introduction has now become a thick friendship. Sajjan is considered to be a colonel and Mahipal Writer Mahipal is comparatively much poorer than both of them but is a very hard working, honest and friendly creature. As soon as he stepped into Da Sajjan’s room, Kanel asked ……….

“मृत्यु के डर के निवारण का शायद सर्वोत्तम उपाय इस बात पर विचार करने में है कि जीवन की एक शुरुआत होती है और एक अंत होता है। एक समय था जब आप नहीं थे: उससे हमे कोई मतलब नहीं होता। तो फिर हमें क्यों तकलीफ होती है कि ऐसा समय आएगा जब हम नहीं होंगे? मृत्यु के बाद सब कुछ वैसा ही होता है जैसा हमारे जन्म से पहले था।” विलियम हज़्लिट्ट
“Perhaps the best cure for the fear of death is to reflect that life has a beginning as well as an end. There was a time when you were not: that gives us no concern. Why then should it trouble us that a time will come when we shall cease to be? To die is only to be as we were before we were born.” William Hazlitt

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