ग्रहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा : श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा हिन्दी पीडीएफ़ पुस्तक | Gruhlakshmi Ki Pratistha : by Shri Ram Sharma Acharya Hindi PDF Book

Book Nameग्रहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा / Gruhlakshmi Ki Pratistha
Author
Category, , , , ,
Language
Pages 25
Quality Good
Size 100 MB
Download Status Available

पुस्तक का विवरण : प्रत्येक जीव के जीवन मे यौवन के उभार के समय एक ऐसा अवसर आता है, जब वह धीरे धीरे इस बात का अनुभव करने लगता है की उसके पास कुछ वस्तुओं गुणो, स्वाभाविक विशेषताओं की कमी है । पुरुष मे यौवन का उभार आने पर जहां पुरुषत्व विकसित होता है , वहाँ उसके अन्तर्मन मे कामवेग भी उत्पन्न होता है…….

Pustak Ka Vivaran : pratyek jeev ke jeevan me yauvan ke ubhaar ke samay ek aisa avasar aata hai, jab vah dheere dheere is baat ka anubhav karane lagata hai kee usake paas kuchh vastuon guno, svaabhaavik visheshataon kee kamee hai . purush me yauvan ka ubhaar aane par jahaan purushatv vikasit hota hai , vahaan usake antarman me kaamaveg bhee utpann hota hai………….

Description about eBook : In the life of every creature, there is an opportunity when youth emerges, when he gradually begins to feel that he possesses some things, lack of qualities, natural characteristics. At the emergence of puberty in men, where male masculence develops, there is also the impulse generated in the body……………

“मैं मानवता से हैरान हूँ। क्योंकि मनुष्य पैसा कमाने के लिए अपने स्वास्थ्य को बलिदान करता है। फिर अपने स्वास्थ्य को पाने के लिए वह धन खर्च करता है। वह भविष्य के बारे में इतना चिंतित रहता है कि वर्तमान का आनंद नहीं लेता है; नतीजा यह होता है कि वह न वर्तमान में और न भविष्य में जीता है; वह ऐसे जीता है जैसे कि कभी मरने वाला नहीं है, और फिर मरता है जैसे वास्तव में कभी जिया ही नहीं हो।” ‐ दलाई लामा
“I am surprised by humanity. Because a man sacrifices his health in order to make money. Then he sacrifices money to recuperate his health. And then he is so anxious about the future that he does not enjoy the present; the result being that he does not live in the present or the future; he lives as if he is never going to die, and then dies having never really lived.” ‐ Dalai Lama

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