अपभ्रंश भाषा और साहित्य : देवेंद्र कुमार जैन द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक – साहित्य | Apabharansh Bhasha Or Sahitya : by Devendra Kumar Jain Hindi PDF Book – Literature (Sahitya)

अपभ्रंश भाषा और साहित्य : देवेंद्र कुमार जैन द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक - साहित्य | Apabharansh Bhasha Or Sahitya : by Devendra Kumar Jain Hindi PDF Book - Literature (Sahitya)
पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name अपभ्रंश भाषा और साहित्य / Apabharansh Bhasha Or Sahitya
Author
Category, , ,
Language
Pages 370
Quality Good
Size 12.4 MB
Download Status Available

पुस्तक का विवरण : जिस भाषा और साहित्य की चर्चा आगे की गई है, उसकी खोज खबर की कहानी पचास साल पुरानी है | वैसे सन १८७७ में प्रसिद्ध जर्मन विद्वान पिशल, हेमचन्द्र के ‘सिद्धहेमशाब्दानुशासन’ के प्राकृत आशंका संपादन कर चुके थे फिर भी अपभंश पर शोध-कार्य का प्रारंभ उस समय से होता है जब सन १९०२ में पिशल महोदय ने अपना ‘मारेरी अलिएन सूर केन्टीनम डेस अपश्रंश’ लेख प्रकाशित किया……

Pustak Ka Vivaran : Jis bhasha aur sahity ki charcha aage ki gai hai, uski khoj khabar ki kahani pachas saal purani hai. Vaise san 1877 mein prasiddh jarman Vidvan Pishal, Hemchandr ke siddhahemashabdanushasan ke prakrt aashanka sampadan kar chuke the phir bhi apabhansh par shodh-kary ka prarambh us samay se hota hai jab san 1902 mein pishal mahoday ne apna mareri alien soor kentinam des apabhransh lekh prakashit kiya…………

Description about eBook : The story of the language and literature that has been discussed in the discussion of the story is fifty years old. In 1877, the famous German scholar, Pishal, had acquired the prakruti fear of ‘Siddheshamabadanushashan’ of Hemchandra, but still the start of research was done from the time that in 1902, the Pishal sir had given his’ mareri aliin sur centenum des abhira ‘Published the article………….

“जब दूसरे व्यक्ति सोए हों, तो उस समय अध्ययन करें; उस समय कार्य करें जब दूसरे व्यक्ति अपने समय को नष्ट करते हैं; उस समय तैयारी करें जब दूसरे खेल रहे हों ; और उस समय सपने देखें जब दूसरे केवल कामना ही कर रहे हों।” ‐ विलियम आर्थर वार्ड
“Study while others are sleeping; work while others are loafing; prepare while others are playing; and dream while others are wishing.” ‐ William Arthur Ward

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