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काश्मीर शिवाद्वयवाद में प्रमाण – चिन्तन / Kashmir Shivadvayvad Mein Praman – Chintan

काश्मीर शिवाद्वयवाद में प्रमाण - चिन्तन : नवजीवन रस्तोगी द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक - आध्यात्मिक | Kashmir Shivadvayvad Mein Praman - Chintan : by Navjeevan Rastogi Hindi PDF Book - Spiritual (Adhyatmik)
पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name काश्मीर शिवाद्वयवाद में प्रमाण – चिन्तन / Kashmir Shivadvayvad Mein Praman – Chintan
Author
Category,
Language
Pages 288
Quality Good
Size 25.6 MB
Download Status Available

सभी मित्र हस्तमैथुन के ऊपर इस जरूरी विडियो को देखे, ज्यादा से ज्यादा ग्रुप में शेयर करें| भगवान नाम जप की शक्ति को पहचान कर उसे अपने जीवन का जरुरी हिस्सा बनाये|

काश्मीर शिवाद्वयवाद में प्रमाण – चिन्तन का संछिप्त विवरण : ऊपर के विवेचन से जो बात साफ उभर कर आती है वह है कि तत्त्वमीमासा और परमार्थमीमांसा के बीच में आत्यन्तिक दरार नहीं है, फिर भी वे एक हैं यह कहना ठीक न होगा। ज्ञान के तात्विक और प्रमाणमीमांसक रूप में गहरा अंतःसंबंध है। शैव दर्शन की आधारभूत प्रतिज्ञा है कि महेश्वर, अर्थात्‌ चरम सत्ता, कर्ता और ज्ञाता है – कर्तृता और ज्ञातृता, सीधे…

Kashmir Shivadvayvad Mein Praman – Chintan PDF Pustak Ka Sankshipt Vivaran : Upar ke Vivechan se jo bat Saph ubhar kar aati hai vah hai ki Tattvameemasa aur Paramarthameemansa ke beech mein Aatyantik darar nahin hai, phir bhee ve ek hain yah kahana theek na hoga. Gyan ke Tattvik aur Pramanameemansak roop mein gahara Ant:sambandh hai. Shaiv darshan kee Aadharabhoot Pratigya hai ki Maheshvar, Arthat‌ charam satta, Karta aur Gyata hai – Kartrta Aur Gyatrta, Seedhe………..
Short Description of Kashmir Shivadvayvad Mein Praman – Chintan PDF Book : What emerges from the above discussion is that there is no absolute rift between Tattvamimasa and Paramarthamimamsa, yet it is not right to say that they are one. There is a deep interconnection in the fundamental and authentic form of knowledge. The basic vow of Shaivism is that Maheshwar, that is, the ultimate power, doer and knower……….
“सम्पन्नता कीमती साज-सामान एकत्रित करना नहीं बल्कि अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना है।” ‐ एपिक्टेटस
“Wealth consists not in having great possessions, but in having few wants.” ‐ Epictetus

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