स्वतंत्र दिल्ली (११ मई १८५७ – २० सितम्बर १८६७) : डॉ. सैयद अतहर अब्बास रिजवी द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक – इतिहास | Svatantra Delhi (11 May 1857 – 20 September 1857) : by Dr. Syed Athar Abbas Rizvi Hindi PDF Book – History (Itihas)

स्वतंत्र दिल्ली (११ मई १८५७ - २० सितम्बर १८६७) : डॉ. सैयद अतहर अब्बास रिजवी द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक - इतिहास | Svatantra Delhi (11 May 1857 - 20 September 1857) : by Dr. Syed Athar Abbas Rizvi Hindi PDF Book - History (Itihas)
पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name स्वतंत्र दिल्ली (११ मई १८५७ – २० सितम्बर १८६७) / Svatantra Delhi (11 May 1857 – 20 September 1857)
Author
Category, ,
Language
Pages 285
Quality Good
Size 142 MB
Download Status Available

पुस्तक का विवरण : भारतीयों के साथ भारतीयों ही ने विश्वासघात किया और भारतमाता के चरणों में पुनः दासता की श्रृंखलाएँ डाल दी गईं किन्तु जिस प्रकार के स्वतंत्र राज्य का उस समय के लोगों ने स्वप्न देखा था, उसे इतिहास कभी न भूल सकेगा। जब कभी भी साम्प्रदायिकता पर प्रहार तथा भारतीय संघटन एवं राष्ट्र के गौरव के विषय में कोई बात चलेगी तो स्वतंत्रता के इन शहीदों के प्रति…….

Pustak Ka Vivaran : Bharatiyon ke sath bharatiyon hi ne Vishvasaghat kiya aur bharatamata ke charanon mein punah dasata ki shrinkhalayen dal di gayin kintu jis prakar ke svatantra Rajy ka us samay ke logon ne svapn dekha tha, use itihas kabhi na bhool sakega. Jab kabhi bhi Sampradayikata par prahar tatha bharateey sanghatan evan Rashtra ke gaurav ke vishay mein koi bat chalegi to svatantrata ke in shaheedon ke prati……..

Description about eBook : Indians were unfaithful to Indians and chains of slavery were put again at the feet of Bharatmata, but history will never forget the kind of free state that people dreamed of then. Whenever there will be any talk about the attack on communalism and the pride of the Indian Union and the nation, then to these martyrs of freedom …….

“बुद्धिमान व्यक्ति उस समय सीखते हैं जब वे ऐसा कर सकते हैं, लेकिन मूर्ख व्यक्ति उस समय सीखते हैं जब उनके लिए ऐसा करना बहुत जरुरी हो जाता है।” ‐ आर्थर वैलेस्ले
“Wise people learn when they can; fools learn when they must.” ‐ Arthur Wellesley

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