युगमनु – प्रसाद : डॉ. ब्रज किशोर मिश्र द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक – साहित्य | Yugmanu – Prasad : by Dr. Braj Kishore Mishra Hindi PDF Book – Literature (Sahitya)

युगमनु - प्रसाद : डॉ. ब्रज किशोर मिश्र द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक - साहित्य | Yugmanu - Prasad : by Dr. Braj Kishore Mishra Hindi PDF Book - Literature (Sahitya)
पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name युगमनु – प्रसाद / Yugmanu – Prasad
Author
Category, ,
Language
Pages 258
Quality Good
Size 21 MB
Download Status Available

युगमनु – प्रसाद का संछिप्त विवरण : प्रसाद भारतीय नारी के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु थे। उन्हे नारी के अन्तर की पहुचान अत्यधिक गहरी थी | अपने समस्त साहित्य मे नारी के प्रति उनकी दृष्टि अत्यधिक उदार रही है। इसका एकमात्र कारण यह है कि नारी समाज की वह वीणा है जिसका स्पर्श करते ही एक ऐसा स्वर निकलता है जिसमे केवल करुणा भक्त होती है। उसमे विवद्यता है, त्याग है। कवि का कार्य जनता के जीवन को जाग्नत करना है………

Yugmanu – Prasad PDF Pustak Ka Sankshipt Vivaran : Prasad Bharatiya nari ke prati atyant shraddhalu the. Unhe nari ke antar ki Pahuchan atyadhik gahari thi. Apane samast sahity me nari ke prati unaki drshti atyadhik udar rahi hai. Isaka ekmatra karan yah hai ki nari samaj ki vah veena hai jisaka sparsh karate hi ek aisa svar nikalata hai jisame keval karuna bhakt hoti hai. Usame Vivadyata hai, tyag hai. Kavi ka kary janata ke jeevan ko jagnat karana hai……….
Short Description of Yugmanu – Prasad PDF Book : Prasad was extremely devoted to the Indian woman. They had deep penetration of the woman’s gap. In all her literature, her vision towards women has been very liberal. The only reason for this is that woman is the veena of society whose touch brings out a tone in which only compassion is devoted. There is curiosity in it, renunciation. The poet’s job is to awaken the life of the public …….
“शुरू में वह कीजिए जो आवश्यक है, फिर वह जो संभव है और अचानक आप पाएंगे कि आप तो वह कर रहे हैं जो असंभव की श्रेणी में आता है।” असीसी के संत फ़्रांसिस (११८२-१२२६), इतालवी साधु
“Start by doing what’s necessary; then do what’s possible; and suddenly you are doing the impossible.” St. Francis of Assisi (1182-1226), Italian Saint

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