अम्बपाली : रामरतन भटनागर द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक – उपन्यास | Ambapali : by Ramratan Bhatnagar Hindi PDF Book – Novel (Upanyas)

Book Nameअम्बपाली / Ambapali
Author
Category, , , , , ,
Language
Pages 177
Quality Good
Size 9 MB
Download Status Available

पुस्तक का बिबरण : इस उपन्यास में मैंने बुद के समय का चित्रण किया है। इसके ऊपर बह रंगीन आवरण नहीं है जिसे रोमांच लेखक पिछले युग पर दाल देते है। कथा का केन्द्र वैशाली है। यह हमारा अंतिम प्रजातंत्र राष्ट्र था। जनतंत्र की मांग है। इस नाते यह उपन्यास आपको रुचेगा। आप प्राचीन भारत के एक जनतंत्र से परिचित होंगे………….

Pustak Ka Vivaran : Is Upanyas mein mainne buddh ke samay ka chitran kiya hai. Isake oopar vah rangeen aavaran nahin hai jise romanch lekhak pichhale yug par dal dete hai. katha ka kendra vaishali hai. Yah hamara antim prajatantra rashtra tha. Janatantra ki mang hai. is nate yah upanyas aapako ruchega. Aap prachin bharat ke ek janatantra se parichit honge…………

Description about eBook : In this novel I have illustrated the time of Buddha. Above it is not a color cover, which the thrill writer has poured on the previous era. The center of the story is Vaishali. This was our last democracy nation. Democracy is the demand. In this relationship, this novel will suit you. You will be familiar with a democracy of ancient India………..

“मैं मानवता से हैरान हूँ। क्योंकि मनुष्य पैसा कमाने के लिए अपने स्वास्थ्य को बलिदान करता है। फिर अपने स्वास्थ्य को पाने के लिए वह धन खर्च करता है। वह भविष्य के बारे में इतना चिंतित रहता है कि वर्तमान का आनंद नहीं लेता है; नतीजा यह होता है कि वह न वर्तमान में और न भविष्य में जीता है; वह ऐसे जीता है जैसे कि कभी मरने वाला नहीं है, और फिर मरता है जैसे वास्तव में कभी जिया ही नहीं हो।” ‐ दलाई लामा
“I am surprised by humanity. Because a man sacrifices his health in order to make money. Then he sacrifices money to recuperate his health. And then he is so anxious about the future that he does not enjoy the present; the result being that he does not live in the present or the future; he lives as if he is never going to die, and then dies having never really lived.” ‐ Dalai Lama

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