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उपन्यासकार प्रेमचन्द / Upanyaskar Premchand

उपन्यासकार प्रेमचन्द : श्यामसुन्दर घोष द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक - साहित्य | Upanyaskar Premchand : by Shyam Sundar Ghosh Hindi PDF Book - Literature (Sahitya)
पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name उपन्यासकार प्रेमचन्द / Upanyaskar Premchand
Author
Category, ,
Language
Pages 228
Quality Good
Size 76 MB
Download Status Available

सभी मित्र हस्तमैथुन के ऊपर इस जरूरी विडियो को देखे, ज्यादा से ज्यादा ग्रुप में शेयर करें| भगवान नाम जप की शक्ति को पहचान कर उसे अपने जीवन का जरुरी हिस्सा बनाये|

उपन्यासकार प्रेमचन्द का संछिप्त विवरण : प्रेमचन्द के लेखन काल की संक्षिप्त प्रवधि को, जो कि नानाविध कार्यभारों भर संघर्षों से संवलित है, देखते हुए यह सहज स्वीकार्य है कि उनकी उपलब्धि सामान्य नहीं है । उन्होंने श्रठारह वर्षों के संक्षिप्त काल में ही कई पथों का अनुसंधान किया, उन पर कुछ दूर तक चले और फिर उतर कर दूसरी राह पकड़ते रहे । ऐसा नहीं कि उन्होंने किसो पथ-विशेष का स्पर्श भर किया………..

Upanyaskar Premchand PDF Pustak Ka Sankshipt Vivaran : Premachand ke lekhan kal ki sankshipt pravadhi ko, jo ki nanavidh karyabharon bhar sangharshon se sanvalit hai, dekhate huye yah sahaj sveekary hai ki unaki uplabdhi samany nahin hai. Unhonne shratharah varshon ke sankshipt kal mein hi kayi pathon ka anusandhan kiya, un par kuchh door tak chale aur phir utar kar doosaree rah pakadate rahe. Aisa nahin ki unhonne kiso path-vishesh ka sparsh bhar kiya………..
Short Description of Upanyaskar Premchand PDF Book : Considering the brief period of Premchand’s writing period, which is filled with struggles across multiple assignments, it is readily accepted that his achievement is not ordinary. In a short span of eighteen years, he researched many paths, walked on them for some distance and then got down and took another path. It is not that he touched a particular path…………
“किसी अन्य व्यक्ति की तुलना में अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कार्यरत रहने की आपकी इच्छा आपकी सर्वाधिक मूल्यवान सम्पत्ति हो सकती है।” ‐ ब्रिअन ट्रेसी
“Your most valuable asset can be your willingness to persist longer than anyone else.” ‐ Brian Tracy

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