‘फरवरी’ 2010 मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान : हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक – पत्रिका | ‘February’ 2010 Mantra-Tantra-Yantra Vigyan : Hindi PDF Book – Magazine (Patrika)

'फरवरी' 2010 मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान : हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक - पत्रिका | 'February' 2010 Mantra-Tantra-Yantra Vigyan : Hindi PDF Book - Magazine (Patrika)
पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name 'फरवरी' 2010 मंत्र-तंत्र-यंत्र विज्ञान / 'February' 2010 Mantra-Tantra-Yantra Vigyan
Category, ,
Language
Pages 90
Quality Good
Size 57.7 MB
Download Status Available
 चेतावनी– यह पुस्तक केवल शोध कार्य के लिए है| इस पुस्तक से होने वाले परिणाम के लिए आप स्वयं उत्तरदायी होंगे न कि 44Books.com

पुस्तक का विवरण : जब तक हम मन पर नियंत्रण न करें तब तक मंत्र ७०४५ ही नहीं सकता। मंत्र का तात्पर्य है कि मन पर पूर्ण नियंत्रण करके हम कुछ उच्चरित करें और मन पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हम पूर्ण रूप से समर्पण करें | या तो आपमें क्षमता हो कि आप भगवान विश्वनाथ को अपने सामने उपस्थित करें आप उस काशी में जा सकें जिसकी मैं चर्चा कर रहा हूं या फिर आप अपना हाथ सामने……..

Pustak Ka Vivaran : Jab Tak ham man par Niyantran na karen tab tak Mantra 7045 hi nahin sakata. Mantra ka Tatpary hai ki man par Poorn Niyantran karake ham kuchh Uchcharit karen aur man par Niyantran prapt karane ke liye Aavashyak hai ki ham poorn roop se samarpan karen. Ya to Aapamen kshamata ho ki Aap bhagavan vishvanath ko apane samane Upasthit karen aap us kashi mein ja saken jisaki main Charcha kar raha hoon ya phir aap apana hath Samane vale…………

Description about eBook : Until we control the mind, the mantra cannot be 4085. Mantra means that by exercising complete control over the mind, we must express something and to achieve mind control it is necessary that we surrender completely. Either you have the ability to present Lord Vishwanath in front of you, you can go to the Kashi that I am talking about, or you can put your hand in the front ………….

“जब तक किसी व्यक्ति द्वारा अपनी संभावनाओं से अधिक कार्य नहीं किया जाता है, तब तक उस व्यक्ति द्वारा वह सब कुछ नहीं किया जा सकेगा जो वह कर सकता है।” ‐ हेनरी ड्रम्मन्ड
“Unless a man undertakes more than he possibly can do, he will never do all that he can.” ‐ Henry Drummond

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