साहित्य – समीक्षांजाल : डॉ. सुधीन्द्र द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक – साहित्य | Sahitya – Samikshanjal : by Dr. Sudhindra Hindi PDF Book – Literature (Sahitya)

साहित्य - समीक्षांजाल : डॉ. सुधीन्द्र द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक - साहित्य | Sahitya - Samikshanjal : by Dr. Sudhindra Hindi PDF Book - Literature (Sahitya)
पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name साहित्य – समीक्षांजाल / Sahitya – Samikshanjal
Author
Category, ,
Language
Pages 288
Quality Good
Size 16 MB
Download Status Available

साहित्य – समीक्षांजाल का संछिप्त विवरण : साहित्य का क्षेत्र विशाल और व्यापक है, उसके अन्तर्गत विषयों की कोई इयत्ता नहीं, अतः ऐसा संग्रह पूर्ण होने का तो दावा कर ही नहीं सकता, फिर भी इसमें यह प्रयक्ष अवश्य है कि एक ही संकलन में विविध आवश्यक साहित्यिक विषय समाविष्ट हो सकें | ये निबन्ध हिन्दी साहित्य की पृष्ठभूमि में ही पढ़े जाने चाहिए | इस संग्रह के लिए; अपने निबन्धों को प्रदान करने की आज्ञा के लिए लेखक विद्वान लेखकों…..

 Sahitya – Samikshanjal PDF Pustak Ka Sankshipt Vivaran : Sahity ka kshetra vishal aur vyapak hai, usake antargat vishayon ki koi iyatta nahin, At: aisa sangrah purn hone ka to dava kar hi nahin sakata, phir bhi isamen yah prayaksh avashy hai ki ek hi sankalan mein vividh Aavashyak sahityik vishay samavisht ho saken. Ye Nibandh hindi sahity ki prshthabhumi mein hi padhe jane chahiye. Is Sangrah ke liye; apane Nibandhon ko pradan karane ki Aagya ke liye lekhak vidvan lekhakon…..
Short Description of Sahitya – Samikshanjal PDF Book : The field of literature is large and wide, there is no requirement of subjects under it, so while such a collection cannot be claimed to be complete, yet it is necessary to include various essential literary subjects in a single compilation. These essays should be read only in the backdrop of Hindi literature. For this collection; Writers scholarly authors for the order to provide their own essays ……
“हम अपने कार्यों के परिणाम का निर्णय करने वाले कौन हैं? यह तो भगवान का कार्यक्षेत्र है। हम तो एकमात्र कर्म करने के लिए उत्तरदायी हैं।” ‐ गीता
“Who are we to decide: what will be the outcome of our actions? It is God’s domain. We are just simply responsible for the actions.” ‐ Geeta

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