क ख ग : मृदुला सिन्हा | Ka Kha Ga : By Mridula Sinha Hindi Book

क ख ग : मृदुला सिन्हा | Ka Kha Ga : By Mridula Sinha Hindi Book
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पुस्तक के कुछ अंश

मास्टर साहब ने स्लेट और पेंसिल पकड़ते ही लिखना सिखाया था ‘क’ को सीखना कितना कठिन था। इसके बाद दो सारे अक्षर आमान लगे। अपने बबलू को ‘क’ सिखाते समय मैंने कितने थप्पड़ लगाए। कोई मंदबुद्धि का न था मेरा मुन्ना। फिर भी ‘क’ सीखने में उसे कठिनाई हुई ‘क’ पहले ही क्यों लिखना पड़ता है ? इसकी सार्थकता शाश्वत है। ‘क’ से यदि तात्पर्य कमाने का हो, तो ‘ख’ खाने एवं ‘ग’ गाने के अर्थ में प्रयुक्त हो सकता है।
‘क’ मतलब कमाई, यानी मुद्रा स्रोत कुछ भी हो, अर्थोपार्जन तो करना ही पड़ता है। इसकी सीमा अब तक किसी ने निर्धारित नहीं की। हो भी नहीं सकती में भी लिखा है- धन की लिप्सा उसकी निर्धारित सीमा तक पहुँचकर भी बढ़ती ही जाती है। तभी तो भिखारी पैसा चाहता है, मजदूर रुपया, कर्मचारी सैकड़ा, व्यापारी हजार-लाख करोड़ लखपति, करोड़पति अथवा अरबपतियों की भी संसार में कमी नहीं है।
“ख” का तात्पर्य खाने भर से नहीं वरन हमारी अनिवार्य आवश्यकताओं से भी है। भोजन, वस्त्र तथा आवास-ये तीनों हमारी अनिवार्य आवश्यकताएँ बताई गई है। ये अनिवार्य आवश्यकताएँ भी बहुतों को नसीब नहीं, फिर भी वे ईश्वर की कृपा से जिंदा हैं।

पुस्तक का विवरण / Book Details
Book Name क ख ग | Ka Kha Ga
Author
Categoryसंस्कृति | Culture Hindi Books
Language
Pages 148
Quality Good
Download Status Not for Download
“जिस व्यक्ति को पर्याप्त भी कम लगता हो उसके लिये कितनी भी उपलब्धता अपर्याप्त है।” एपिक्युरस
“Nothing is enough to the man for whom enough is too little.” Epicurus

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