Mera Aahar Mera Swasthya : By Dr. Nagendra Kumar Neeraj Hindi Book | मेरा आहार मेरा स्वास्थ्य : डॉ नागेंद्र कुमार नीरज द्वारा हिंदी पुस्तक
मेरा आहार मेरा स्वास्थ्य पुस्तक पीडीएफ के कुछ अंश :
डॉ. नीरज द्वारा लिखित मेरा आहार मेरा स्वास्थ्य का तृतीय भाग का संशोधित नवीन संस्करण पाठकों के लिए उपलब्ध हो चुका है। यह विशेष प्रसन्नता की बात है। डॉ. नीरज जिस निष्ठा तथा लगन के साथ प्राकृतिक चिकित्सा के साथ-साथ अध्ययन तथा शोधकार्य में लगे हैं, वह अति सराहनीय एवं स्तुत्य है।
जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन आहार का शरीर और मन के स्वास्थ्य से निकट का सम्बन्ध है। भगवतगीता में सात्विक, राजस और तामस आहार की बात कही गई है। आध्यात्मिक साधना में आहार का एक विशेष स्थान है। सात्विक आहार नियमपूर्वक और संयम के साथ लेना साधक के लिए आवश्यक माना गया है। आम आदमी भी स्वास्थ्य की रक्षा चाहता है तो क्या खाना, कितना खाना, कब खाना आदि बातों पर उसे ध्यान देना ही होगा। आज हम देख रहे हैं कि बहुत सारी बीमारियों की जड़ है गलत आहार बीमारियों के इलाज के लिए हजारों रुपया खर्च करने वाले अगर अपने आहार की ओर देखेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि वे बीमारी के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं।
संत विनोबा जी कहा करते थे कि वर्णमाला में “य” के बाद “र” आता है। हमें योगी बनना चाहिए, अगर नहीं बनेंगे तो रोगी बनेंगे। समत्वम् योगमुच्यते योग यानि समत्व आहार- विहार में, यानि हर क्रिया में समत्व यह सघ जाये तो फिर रोग हमारे पास आने की हिम्मत नहीं करेंगे। स्वास्थ्य की रक्षा आज एक गम्भीर समस्या बन गई है। मनुष्य प्रकृति के साथ जीये तो रोग के रूप में आने वाली विकृति से वह दूर रहेगा। प्रस्तुत पुस्तक में एक-एक आहार सामग्री की रोग-प्रतिरोधक एवं निवारण क्षमता की आयुर्वेज्ञानिक व्याख्या की गई है, जो शोध व अनुभवाम्य है।
| पुस्तक का विवरण / Book Details | |
| Book Name | Mera Aahar Mera Swasthya | मेरा आहार मेरा स्वास्थ्य |
| Author | Nagendra Kumar Neeraj |
| Category | Ayurveda books pdf free download in hindi Health Book in Hindi |
| Language | हिंदी / Hindi |
| Pages | 256 |
| Quality | Good |
| Download Status | Not for Download |
“जब आप अपने मित्रों का चयन करते हैं तो चरित्र के स्थान पर व्यक्तित्व को न चुनें।” डब्ल्यू सोमरसेट मोघम
“When you choose your friends, don’t be short-changed by choosing personality over character.” W. Somerset Maugham
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