बबूल और कैक्टस : रामदरस मिश्रा | Babool Aur Cactus : By Ramdarash Mishra Hindi Book
पुस्तक के कुछ अंश
रामदरश मिश्र के निबंध एक मिश्रित भाव छोड़ते हैं। इनमें गोपनीय को प्रकट करने वाली सोत्साह उत्कटता भी है तो तमाम चीज़ों पर एक व्यक्ति की हिकारत भरी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का भाव भी। इनमें एक ओर गाँव है-अतीत में बसा तो ठीक उसके समानान्तर शहर में छटपटाता एक बुद्धिजीवी। बुनियादी तौर पर ये निबंध कथात्मक टिप्पणियां हैं। इनमें लेखक ने कविता का उपयोग तो किया ही है-लोकचित्त को उद्घाटित कर ‘लोकरस’ का माधुर्य भी दिया है। कविता की रम्यधारा प्रकृति के विवरणों और त्रास को उभारने में सक्षम है। पर इन विवरणों के ‘भाषिक गुण’ कोई भाषाविद् ही रेखांकित कर सकता है या कोई वैयाकरण एक भाव-संसक्त भाषा को किसी नये विधान के रूप में रेखांकित भी कर सकता है। एक सामान्य पाठक के लिए ये निबंध हमारे वास्तव की ईमानदार सूचनाएं हैं।
| पुस्तक का विवरण / Book Details | |
| Book Name | बबूल और कैक्टस | Babool Aur Cactus |
| Author | Ramdarash Mishra |
| Category | Literature Book in Hindi |
| Language | हिंदी / Hindi |
| Pages | 184 |
| Quality | Good |
| Download Status | Not for Download |
“हम अपने विगत काल के बारे में सोच-सोच कर ही अपना भविष्य बिगाड़ बैठते हैं।” पर्सियस
“We consume our tomorrows fretting about our yesterdays.” Persius
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