तप्त रेत पर नंगे पाँव : श्रीमती मंजुला गुप्ता हिंदी पुस्तक | Tapat Ret Par Nange Panva : By Shrimati Manjula Gupta Hindi Book
तप्त रेत पर नंगे पाँव पुस्तक पीडीएफ के कुछ अंश : जीवन इंद्रधनुषी सपनों का मोहपाश नहीं, अपितु कंकरौली, पथरीलो, तस रेतीली चट्टानों पर नंगे पाँवों पर चलने की एक अनवरत यात्रा है। यहाँ समुद्र की उत्ताल तरंगे हैं, ज्वार भाटाओं के सदृश्य, धरती का अदम्य साहस एवं आवेग छिपा है। मंद-मंद वायु के मध्य हरियाली चादर ओढ़े यह वसुंधरा जब अपनी ही संतानों को परस्पर लड़ते-मरते एवं अत्याचार करते देखती हैं, अकारण ही निर्दोषों का रक्तरंजित हो, आँसू बहाते देखती है, तो वह क्रोध से कांप नागिन सी फूत्कार उठती है। भूकंप का विकराल रूप धर वह अपनी ही संतान को दंडित करने से नहीं चूकती। नारी को भी धरा का पर्याय माना गया है वह भी घर परिवार की प्रसन्नता एवं सुख शान्ति बनाये रखने के लिए एक सीमा तक संघर्ष करती है। सामंजस्य बनाये रखती है। परिवार को एक सूत्र में बांध के रखना वह अपना एक नैतिक दायित्व समझती है परन्तु शोषण अपमान एवं हिंसा की, जंक लगी दुधारी पर चलते-चलते अंत में विद्रोह कर बैठती है। इस उपन्यास में मैंने यही दर्शाने का प्रयास किया है।
मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास “निर्मला” से प्रभावित होकर मैंने इस उपन्यास को लिखने का साहसिक कदम उठाया, परन्तु उनके समय में और वर्तमान युग में एक बड़ा परिवर्तन मैंने यह पाया कि उस काल में नारी परिस्थितियों के आगे घुटने टेक, अंतिम क्षण तक घुट-घुट कर तड़प-तड़प कर मरने को विवश हो जाती थी, परन्तु आज स्थिति ऐसी नहीं हैं वह संघर्ष करती हैं, परिस्थितियों से लड़ती है, परन्तु हारती कदापि नहीं, वह किसी उद्दाम उफनती नदी के सदृश्य राह में आये भारी चट्टानों के हृदय को रौंदती चीरती अपनी राह बनाती हुई उसी तत्परता से आगे बढ़ जाती है जिस भीषण आवेग के संग वह अपने उद्गम स्थल से निकली थी।
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| पुस्तक का विवरण / Book Details | |
| Book Name | तप्त रेत पर नंगे पाँव | Tapat Ret Par Nange Panva |
| Author | डॉ मंजुला / Dr Manjula |
| Category | Novel Book in Hindi PDF |
| Language | हिंदी / Hindi |
| Pages | 96 |
| Quality | Good |
| Download Status | Not for Download |
“अगर किसी को अपने कर्म में सुखी होना है, तो इन तीन चीजों की आवश्यकता है: वे उसके लिए उपयुक्त हों; वे इसकी अति न करें; और उन्हें इस कर्म में सफलता का आभास हो।” ‐ जॉन रस्किन
“In order that people may be happy in their work, these three things are needed: they must be fit for it; they must not do too much of it; and they must have a sense of success in it.” ‐ John Ruskin
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