रह गई दिशाएं इसी पार : संजीव | Raha Gayi Disaen Isi Par : By Sanjeev Hindi Book
राह गई दिशाएं इसी पार पुस्तक पीडीएफ के कुछ अंश : सृष्टि और संहार, जीवन और मृत्यु के बफर जोन पर खड़े आदमी की नियति से साक्षात्कार करता संजीव का यह उपन्यास हिन्दी साहित्य में जैविकी पर रचा गया पहला उपन्यास है उपन्यास के पारम्परिक ढाँचे में गैर पारम्परिक हस्तक्षेप और तज्जनित रचाव और रसाव इसकी खास पहचान है। निरंतर नए से नए और वर्जित से वर्जित विषय के अवगाहनकर्ता संजीव ने इसमें अपने ही बनाए दायरों का अतिक्रमण किया है और अपने ही गढ़े मानकों को तोड़ा है।
मिथ, इतिहास, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नए से नए विषय तथा चिन्तन की प्रयोग भूमि है यह उपन्यास और यह जीवन और मृत्यु के दोनों छोरों के आर-पार तक ढलकता ही चला गया है, जहाँ काल अनंत है, जहाँ दिशाएँ छोटी पड़ जाती है, जहाँ गहराइयाँ अगम हो जाती हैं और व्याप्तियाँ अगोचर…!
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| पुस्तक का विवरण / Book Details | |
| Book Name | रह गई दिशाएं इसी पार | Raha Gayi Disaen Isi Par |
| Category | Literature Book in Hindi Novel in Hindi PDF Book |
| Language | हिंदी / Hindi |
| Pages | 320 |
| Quality | Good |
| Download Status | Not for Download |
“सात बार गिरें, आठ बार उठ खड़े हों।” – जापान की कहावत
“Fall down seven times, get up eight times.” – Japanese proverb
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